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बांग्लादेश में कुदरत का कहर: कॉक्स बाजार के रोहिंग्या कैंप में भूस्खलन, मलबे में दबने से 8 मासूम बच्चों की मौत

Wed, 08 Jul 2026 06:58 PM IST
राकेश कुमार वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला। Published by: राकेश कुमार Updated Wed, 08 Jul 2026 06:58 PM IST
सार

बांग्लादेश के कॉक्स बाजार के उखिया उपजिले में भारी बारिश के बाद हुए भीषण भूस्खलन में आठ मासूम रोहिंग्या बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई। मलबे में तब्दील हो चुके शरणार्थी कैंप में स्थानीय प्रशासन की ओर से राहत और बचाव कार्य युद्ध स्तर पर चलाया जा रहा है।
 

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bangladesh landslide in coxs bazar eight children die in rohingya camp
बांग्लादेश में भूस्खलन - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

बांग्लादेश के कॉक्स बाजार से एक बेहद दर्दनाक और झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। यहां के उखिया उपजिले में स्थित रोहिंग्या शरणार्थी शिविर पर कुदरत का कहर टूटा है। लगातार भारी बारिश के बाद अचानक भीषण भूस्खलन हुआ। इस तबाही में मिट्टी के ढहने से आठ मासूम बच्चों की मलबे में दबकर मौत हो गई है। वहीं पांच घायल बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। घटना के बाद पूरे शरणार्थी शिविर में चीख-पुकार मच गई। चारों तरफ सिर्फ मातम और बेबसी का मंजर दिखाई दे रहा है। स्थानीय प्रशासन और बचाव टीमें तुरंत मौके पर पहुंच चुकी हैं। मलबे को हटाने और राहत कार्य का काम तेजी से चलाया जा रहा है।
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तबाही का मंजर
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, यह हादसा इतना अचानक हुआ कि किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला। पहाड़ से भारी मात्रा में गीली मिट्टी सीधे अस्थायी झोपड़ियों पर आ गिरी। उस समय बच्चे घरों के भीतर ही मौजूद थे। अचानक आई इस आपदा ने मासूमों को संभलने का एक पल भी नहीं दिया। रोहिंग्या कैंपों की भौगोलिक स्थिति हमेशा से बेहद संवेदनशील रही है। यह क्षेत्र चारों तरफ से मिट्टी के कच्चे पहाड़ों और टीलों से घिरा हुआ है। मानसून के मौसम में यहां का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। लगातार होने वाली तेज बारिश मिट्टी को कमजोर कर देती है, जिससे ऐसे भीषण हादसे होते हैं।
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क्या मलबे में और भी जिंदगियां दबी हैं?
घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय लोग और राहत दल राहत कार्य में जुट गए। संकरे रास्ते और लगातार हो रही बारिश के कारण बचाव कार्य में भारी दिक्कतें आ रही हैं। प्रशासन पूरी मुस्तैदी से स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहा है। प्रभावित परिवारों में कोहराम मचा हुआ है। अपनों को खोने का गम साफ देखा जा सकता है। सुरक्षा बलों और स्वयंसेवकों की मदद से मलबे को हटाने का काम युद्ध स्तर पर जारी है।

यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी इस तरह के हादसों में सैकड़ों शरणार्थी अपनी जान गंवा चुके हैं। हर साल मानसून आते ही यहां रहने वाले लाखों लोगों की धड़कनें बढ़ जाती हैं। प्रशासन को इन संवेदनशील इलाकों के लिए कोई ठोस नीति बनानी होगी।
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