अमरपाल सिंह वर्मा। देश की सर्वोच्च अदालत ने हाल में एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि विकास को लेकर हमारे सोच पर भी गहरा सवाल खड़ा करता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि फुटपाथ पर सुरक्षित चलना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है और सड़कों पर पैदल चलने वालों का अधिकार मोटर वाहनों से अधिक महत्वपूर्ण है। अदालत ने यह कहा है कि इंसान ने पहिए आने से बहुत पहले चलना सीख लिया था। यह केवल एक ऐतिहासिक तथ्य ही नहीं, बल्कि हमारी शहरी और ग्रामीण विकास नीतियों पर एक गहरी टिप्पणी भी है। यह फैसला एक दर्दनाक हादसे की सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें एक पिता ने अपने पांच साल के बेटे को सड़क दुर्घटना में खो दिया था। अदालत ने इस मामले को केवल मुआवजे तक सीमित नहीं रखा, कोर्ट ने पैदल चलने वालों के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 से जोड़कर उसे मौलिक अधिकार का दर्जा भी दे दिया। कोर्ट ने मोटर वाहन अधिनियम की कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्यों महत्वपूर्ण और दूरगामी है, इसके लिए कुछ बातों पर विचार करने की जरूरत है। दरअसल, पिछले कुछ दशकों में देश का विकास लगभग पूरी तरह वाहनों के इर्दगिर्द केंद्रित रहा है। शहरों में फ्लाईओवर बने, चौड़ी सड़कें बनीं, एक्सप्रेसवे बने, लेकिन पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित फुटपाथों की जरूरत को लगभग नजरअंदाज कर दिया गया। विडंबना यह है कि देश की एक बड़ी आबादी आज भी पैदल चलकर ही अपनी दैनिक जरूरतें पूरी करती है। गरीब, मजदूर, बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे, दिव्यांग और छोटे कस्बों के लोग सबसे ज्यादा पैदल यात्रा करते हैं, लेकिन सड़कें मानो केवल वाहनों के लिए आरक्षित कर दी गई हैं। अदालत का यह कहना पूरी तरह सही है कि शुरुआत में यह एक तरह का ‘आभिजात्य प्रभाव’ था। जब वाहन केवल अमीरों के पास थे, तब भी पैदल चलने वालों को महत्व नहीं मिला और जैसे-जैसे वाहन सस्ते हुए, पूरी सड़क पर वाहनों का कब्जा हो गया। आज स्थिति यह है कि कई शहरों में फुटपाथ हैं ही नहीं और जहां हैं, वहां दुकानों, ठेलों, पार्किंग और अतिक्रमणों ने उन्हें निगल लिया है।

इस निर्णय में कई महत्वपूर्ण पहलुओं का समावेश है। यह निर्णय नागरिकों के लिए पैदल चलने के अधिकार को स्थापित करता है। अब फुटपाथ कोई सरकारी दया का विषय नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार का प्रश्न है। इसके साथ-साथ अदालत ने नगर निगमों, विकास प्राधिकरणों, नगरपालिकाओं और ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी तय की है। अब वे यह कहकर नहीं बच सकते कि संसाधन नहीं हैं या यह उनकी प्राथमिकता नहीं है। अगर सड़क है तो फुटपाथ भी होना चाहिए। इस फैसले से नागरिकों को कानूनी अधिकार मिला है कि यदि फुटपाथ नहीं हैं, टूटे हुए हैं या उन पर कब्जा है तो वे अदालती दरवाजा खटखटा सकते हैं और हर्जाने की मांग भी कर सकते हैं। अगर इस फैसले को धरातल पर लागू किया जाता है तो इसके दूरगामी लाभ होंगे। सड़क दुर्घटनाओं में बड़ी कमी आएगी। आवाजाही सुगम होगी। प्रदूषण कम करने और पैदल चलने की संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा।

हालांकि कुछ सवाल भी हैं, जैसे कि सरकारें इस फैसले को कितनी गंभीरता से लेंगी? आज देश के अधिकांश छोटे शहरों और कस्बों में फुटपाथ नाम की कोई व्यवस्था नहीं है। जहां फुटपाथ बने भी हैं, वे दुकानों के आगे बढ़े चबूतरों, पार्किंग, सामान रखने के स्थानों और अस्थायी कब्जों में बदल चुके हैं। सवाल यह भी है कि क्या अब नगर निकाय फुटपाथों से अतिक्रमण हटाएंगे? क्या नई सड़क परियोजनाओं में पैदल यात्रियों को प्राथमिकता मिलेगी? क्या सड़क सुरक्षा के बजट में फुटपाथों को भी शामिल किया जाएगा? ये ऐसे प्रश्न हैं जो सुप्रीम फैसले के बाद भी कायम हैं और आम जन चाहेगा कि इनके सकारात्मक उत्तर मिलें। सचमुच, हमारा पूरा यातायात कानून वाहनों को केंद्र में रखकर बनाया गया है, जिसमें इंसान गौण हैं। अब यह सोच बदलने का समय आ गया है।

विभिन्न अदालतों ने समय-समय पर जनहित में फैसले किए हैं, पर उनका क्रियान्वयन कितना हुआ है, इसे देखे जाने की जरूरत है। फुटपाथों पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद अब प्रत्येक शहर और कस्बे में फुटपाथों का सर्वे कराया जाए। अतिक्रमण हटाने के लिए विशेष अभियान चलाए जाएं। नई सड़क परियोजनाओं में फुटपाथ अनिवार्य किए जाने चाहिए। स्कूलों, अस्पतालों और बाजारों के आसपास पैदल यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता मिले। ग्रामीण क्षेत्रों में भी सुरक्षित पैदल मार्गों की योजना बनाई जाए। यह सब जरूरी है, क्योंकि किसी सभ्य समाज की पहचान उसकी चौड़ी सड़कों, फ्लाईओवरों और एक्सप्रेसवे से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वहां सबसे कमजोर और असुरक्षित व्यक्ति कितनी सुरक्षा और सम्मान के साथ चल सकता है। जब पैदल चलने वाला नागरिक सुरक्षित होगा, तभी हम अपने विकास को सचमुच मानवीय विकास कह सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी जिम्मेदारी निभा दी है और एक स्पष्ट संवैधानिक दिशा दे दी है। अब गेंद कार्यपालिका के पाले में है। देखना यह है कि सरकारें इस ऐतिहासिक फैसले को केवल न्यायालय के पन्नों तक सीमित रहने देती हैं या उसे वास्तविकता का स्वरूप देकर साकार करती हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)