विचार: संभव नहीं नेहरू और मोदी की तुलना
वर्ष 1959 में राधा कृष्णनन समिति की अनुशंसा पर देश में कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय बनने का विचार आया और पंतनगर देश का ऐसा पहला विश्वविद्यालय बना।
HighLights
नेहरू गांधीजी की कृपा से, मोदी जनसमर्थन से पीएम बने।
मोदी की सैन्य नीति सुदृढ़, नेहरू की लचर थी।
मोदी ने भारत का स्वाभिमान जगाया, नेहरू ने नहीं।
सुधांशु त्रिवेदी। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और वर्तमान पीएम नरेन्द्र मोदी की तुलना का तथ्यात्मक विश्लेषण करना चाहिए। कैबिनेट मिशन प्लान के तहत नए कांग्रेस अध्यक्ष को अंग्रेजों के अधीन अंतरिम सरकार का नेतृत्व करना था। अप्रैल 1946 में कांग्रेस कार्यसमिति में राज्यों से नाम आए। उनमें एक वोट कृपलानी एवं पट्टाभी सीतारमैया को और शेष सारे वोट सरदार पटेल को थे और नेहरू जी को शून्य वोट। इसके बावजूद गांधीजी की कृपा से नेहरू प्रधानमंत्री के उम्मीदवार बने। ये संदर्भ नेहरू सेलेक्टेड वर्क्स, मौलाना आजाद, सरदार पटेल और कृपलानी जी की पुस्तकों में वर्णित हैं।
इसके बाद वेवल द्वारा ब्रिटिश क्राउन के प्रति निष्ठा की शपथ लेकर 2 सितंबर, 1946 को नेहरू ने अंतरिम सरकार और 15 अगस्त, 1947 को माउंटबेटन द्वारा शपथ लेकर नेतृत्व संभाला। इसके बाद 13 मई, 1952 को वे आम चुनाव जीतकर आए। गांधीजी की कृपा, अंग्रेजों की सुविधा और विपक्ष-विहीन चुनाव से होते हुए वे पीएम पद तक पहुंचे। इसके विपरीत 13 सितंबर, 2013 को भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक में मोदी सर्वसम्मति से पीएम पद के उम्मीदवार बने। संपूर्ण पार्टी का समर्थन और उसके बाद प्रबल जनसमर्थन प्राप्त कर बिना किसी कृपा, सुविधा के पूर्ण बहुमत हासिल करके उन्होंने भारत की लोकतांत्रिक राजनीति का एक नया अध्याय लिखा। इस तरह मोदी की नेहरू से तुलना बेमानी है।
चीन जब तिब्बत में था और चीनी सेना के सामने भुखमरी की चुनौती थी, तब तिब्बत में सड़कें चीन की तरफ नहीं, बल्कि भारत की तरफ बेहतर थीं। नेहरू ने चीनी सेना को 3,500 टन चावल भिजवाया। 1947 में चीन के पास वायु सेना नहीं थी, भारत के पास थी। चीन की वायु सेना 1949 में बनी। फिर भी 1962 में 19 नवबंर, 1962 को नेहरू ने अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी को पत्र लिखकर उनसे सिर्फ विमान ही नहीं मांगे, बल्कि पूर्वोत्तर बचाने के लिए भारतीय वायु सेना की एक प्रकार से कमान अमेरिका को देने के लिए लिखा। अमेरिका में भारत के तत्कालीन राजदूत नेहरू जी के भतीजे बीके नेहरू ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि यह पत्र इतना अपमानजनक था कि राष्ट्रपति के सलाहकार को देने के बाद वे अपने को रोने से नहीं रोक पाए।
जब गलवन में चीन के साथ संघर्ष में हमारे 20 जवान बलिदान हुए तो अंतरराष्ट्रीय स्रोतों के अनुसार चीन के 55-60 सैनिक मारे गए। संभवतः बड़ी संख्या की वजह से ही चीन ने अपने मारे गए सैनिकों की सूची कभी जारी ही नहीं की। बालाकोट के समय पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में वहां के एक सांसद ने कहा था कि पाकिस्तानी विदेश मंत्री बैठे थे, सेना प्रमुख आए। उनके पांव कांप रहे थे और उन्होंने कहा, खुदा का वास्ता है कि अभिनंदन को वापस कर दो, वरना रात 9 बजे तक भारत आक्रमण कर देगा। साफ है कि नेहरू की लचर सैन्य नीति और मोदी की सुदृढ़ सैन्य नीति की कोई तुलना नहीं।
15 अगस्त 1947 को नेहरू स्वतंत्र भारत में सरकार का नेतृत्व संभालते हैं। इसके बाद जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा, अक्साई चिन और मानसरोवर भारत से अलग हो जाता है। पाकिस्तान कश्मीर पर आक्रमण कर देता है और नेहरू स्वयं कश्मीर को यूएन ले जाते हैं और संविधान में अनुच्छेद-370 शामिल करते हैं। दूसरी तरफ मोदी के नेतृत्व में अगस्त 2019 में जब वही अनुच्छेद 370 समाप्त होता है, तब पाकिस्तान और उसके तमाम अंतरराष्ट्रीय आका एक भी प्रस्ताव भारत के खिलाफ यूएन में नहीं ला पाते।
नेहरू ने अंग्रेजों के जाने के बाद भी भारत के स्वाभिमान को उठने नहीं दिया। उन्होंने सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार का विरोध किया और मोदी ने सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मनाया। नेहरू ने 17 मार्च, 1959 को अपने भाषण में कहा था कि दक्षिण भारत के विशाल मंदिरों के गलियारों में वे डिप्रेस्ड महसूस करते हैं और ताजमहल के सामने आनंद से सराबोर रहते हैं। दूसरी तरफ मोदी ने काशी विश्वनाथ, केदारनाथ, महाकाल, करतारपुर साहब कोरिडोर और श्रीरामलला के भव्य मंदिर का मार्ग प्रशस्त कर भारत के स्वाभिमान को जगाया।
नेहरू ने विज्ञान और तकनीक के लिए कुछ आवश्यक कदम उठाए, पर उनका विचार विज्ञान में भी पश्चिम का पिछलग्गू बनने से प्रेरित रहा। भारत कर सकता है, यह आत्मविश्वास उनमें नहीं था। यदि 1950 में ही एम्स के साथ आयुर्वेदिक एम्स भी बन गया होता, जो मोदी ने बनवाया तो आज हम चिकित्सा के इस क्षेत्र में विश्व में अग्रणी होते। तब मलेरिया की हर्बल दवाई का नोबेल पुरस्कार चीन और उपवास रखने पर शरीर को लाभ मिलने का नोबेल पुरस्कार 2016 में जापान को नहीं जाता।
वर्ष 1959 में राधा कृष्णनन समिति की अनुशंसा पर देश में कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय बनने का विचार आया और पंतनगर देश का ऐसा पहला विश्वविद्यालय बना। यह उचित विचार था, पर कृषि में पश्चिम के अंधानुकरण के साथ यदि भारत की परंपरागत जैविक कृषि के लिए भी विश्वविद्यालय बना होता तो आज दुनिया जिस जैविक कृषि के लिए लालायित है, उसमें हम विश्व का नेतृत्व कर रहे होते। मोदी ने आयुर्वेद को विश्व के पटल पर मान्यता दिलवाई और जैविक कृषि का अभियान शुरू किया। होमी भाभा के प्रयासों से भारत नेहरूजी के समय में ही परमाणु शक्ति बन सकता था, पर नेहरू ने ऐसा नहीं किया। मोदी ने भारत की जल, थल और वायु तीनों सेनाओं को आणविक शक्ति से लैस किया।
16 मई, 2014 को जब मोदी के नेतृत्व में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला तो 18 मई को लंदन के अखबार संडे गार्डियन ने अपने संपादकीय का शीर्षक दिया, 'नियति के साथ भारत का दूसरा मिलन।' यह 15, अगस्त 1947 को नेहरू के ऐतिहासिक भाषण 'नियति के साथ भारत का मिलन' से तुलना थी। अखबार ने लिखा कि 1947 के बाद जिन दलों का शासन रहा, वे ब्रिटिश विरासत के विचार से प्रेरित रहे थे। अब एक ऐसे दल के हाथ में पूर्ण सत्ता आई है, जिस पर कोई ब्रिटिश प्रभाव नहीं है। उसने यह भी लिखा कि 16 मई, 2014 का दिन भारत के इतिहास में इस रूप में अंकित होना चाहिए, जिस दिन अंग्रेज अंतिम और निर्णायक रूप से भारत से विदा हो गए।
(लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं)












