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अवसाद के कारण समय से पहले मौत का खतरा दोगुना : अध्य्यन
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संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। अवसाद (डिप्रेशन) केवल मानसिक परेशानी नहीं बल्कि समय से पहले मौत का खतरा भी बढ़ा सकता है। विश्व मनोचिकित्सा जर्नल में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया है कि अवसाद से पीड़ित लोगों में किसी भी कारण से मृत्यु का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में लगभग दोगुना होता है, जबकि आत्महत्या का जोखिम करीब 10 गुना तक बढ़ जाता है।
मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास) के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. ओम प्रकाश ने बताया कि अवसाद का असर केवल मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता। इससे हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसी बीमारियों से मृत्यु का खतरा भी बढ़ जाता है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि अवसाद की पहचान होने के शुरुआती छह महीनों में जोखिम सबसे अधिक रहता है।
उन्होंने कहा कि अवसाद के लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार उदासी, तनाव, नींद और भूख में बदलाव या किसी काम में रुचि खत्म होना इसके संकेत हो सकते हैं। समय पर इलाज शुरू करने से मृत्यु का खतरा 20 से 30 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार बढ़ते तनाव और बदलती जीवनशैली के बीच मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लेना जरूरी हो गया है।
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नई दिल्ली। अवसाद (डिप्रेशन) केवल मानसिक परेशानी नहीं बल्कि समय से पहले मौत का खतरा भी बढ़ा सकता है। विश्व मनोचिकित्सा जर्नल में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया है कि अवसाद से पीड़ित लोगों में किसी भी कारण से मृत्यु का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में लगभग दोगुना होता है, जबकि आत्महत्या का जोखिम करीब 10 गुना तक बढ़ जाता है।
मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास) के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. ओम प्रकाश ने बताया कि अवसाद का असर केवल मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता। इससे हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसी बीमारियों से मृत्यु का खतरा भी बढ़ जाता है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि अवसाद की पहचान होने के शुरुआती छह महीनों में जोखिम सबसे अधिक रहता है।
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उन्होंने कहा कि अवसाद के लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार उदासी, तनाव, नींद और भूख में बदलाव या किसी काम में रुचि खत्म होना इसके संकेत हो सकते हैं। समय पर इलाज शुरू करने से मृत्यु का खतरा 20 से 30 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार बढ़ते तनाव और बदलती जीवनशैली के बीच मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लेना जरूरी हो गया है।
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