Cross-Border Smuggling: तस्करों ने सुपारी को लोकल पैदावार बताया, 'मनी लॉन्ड्रिंग और हवाला' की कहानी क्या?
म्यांमार से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ई़डी) की जांच में कई सवाल उभर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारत-म्यांमार सीमा पर 'सुपारी' कहां से आई? जांच में सामने आई बातों के मुताबिक तस्करी को लोकल पैदावार बताया गया। 'मनी लॉन्ड्रिंग और हवाला' की कहानी क्या है? जानिए
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प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के गुवाहाटी जोनल ऑफिस ने 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट 2002 की धारा 17 के तहत असम, मिजोरम, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में 20 जगहों पर छापेमारी की है। यह कार्रवाई भारत-म्यांमार सीमा के पार सुपारी (अरेका नट) की तस्करी और उससे हुई कमाई को लॉन्डर करने (अवैध धन को वैध बनाने) में शामिल एक बड़े, संगठित सिंडिकेट की जांच के सिलसिले में की गई। लंबे समय तक भारत-म्यांमार सीमा पर 'सुपारी' की तस्करी होती रही। तस्करी को लोकल पैदावार बताकर 'मनी लॉन्ड्रिंग और हवाला' के जरिए काली कमाई की राह तैयार की गई। खास बात है कि जिस जगह का नाम सुपारी की पैदावार के लिए फाइलों में दिखाया गया, वहां सुपारी की पैदावार ही नहीं होती। सुपारी को दूसरे मुल्कों से बॉर्डर पर लाकर यह दिखाया गया कि आसपास ही इसकी पैदावार होती है।
यह मामला असम के अलग-अलग पुलिस स्टेशनों में दर्ज कई एफआईआर से जुड़ा है। इनमें आईपीसी, 1860 की विभिन्न धाराओं और कस्टम्स एक्ट, 1962 के तहत सुपारी की अवैध तस्करी और कस्टम ड्यूटी की चोरी से जुड़े अपराध शामिल हैं। जांच में डायरेक्टोरेट ऑफ़ रेवेन्यू इंटेलिजेंस की गुवाहाटी ज़ोनल यूनिट की जानकारी का इस्तेमाल किया गया है। डीआरआई ने पहले गुवाहाटी हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद 655.32 मीट्रिक टन सुपारी और उसे लाने-ले जाने में इस्तेमाल होने वाले वाहनों को जब्त किया था।
जांच से पता चला कि यह सिंडिकेट मिज़ोरम (मुख्य रूप से चम्फाई ज़िला) में मौजूद सप्लायर्स के नेटवर्क के ज़रिए काम करता था, जो भारत-म्यांमार सीमा से सुपारी की तस्करी में शामिल थे। इनमें ह्मिंगथानज़ामी (मालिक, बेकी कुहवा डॉर), लालरिंचानी (मालिक, एलआर स्टोर) और लालेंकावली (मालिक, केएल स्टोर)। इसके अलावा, असम में मौजूद मददगार (फैसिलिटेटर) भी शामिल थे। अबूब अहमद मजूमदार (पूरे सिंडिकेट के मुख्य मददगारों में से एक) और प्रदीप कुमार पॉल (मालिक, शारदा ट्रेडर्स) का नाम भी केस में शामिल है।
साथ ही, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में फैले कंसाइनी/फाइनेंसर भी इस मामले में शामिल रहे हैं। इनमें फलाकाटा की जय माताजी एंटरप्राइजेज, नबद्वीप की नबद्वीप अरेकानट प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड, वाराणसी की शुभ ट्रेडिंग कंपनी और चिमेरा इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड का नाम एफआईआर में लिखा है। वाराणसी की लिमिटेड कंपनी, सर्कुलर ट्रेडिंग में मदद करने वाले इनवॉइस प्रोवाइडर यानी कोलकाता के शशि कुमार चौधरी (प्रोप्राइटर, एसके एंटरप्राइजेज) और लॉजिस्टिक्स सुविधा देने वाली कंपनी बीकानेर असम रोडलाइंस इंडिया लिमिटेड (गुवाहाटी) भी केस में आरोपी हैं।
यह सिंडिकेट म्यांमार से विदेशी सुपारी की तस्करी भारत-म्यांमार सीमा पर स्थित चम्फाई-ज़ोखाव्थर रास्ते से करता है। चम्फाई में खुद सुपारी की पैदावार नहीं होती। केंद्र और राज्य सरकार की एजेंसियों से मिले आधिकारिक प्रोडक्शन डेटा से पता चला कि चम्फाई ज़िले से, जहाँ से ज़्यादातर खेप आने की बात कही गई थी, उन वर्षों में सुपारी का कोई घरेलू उत्पादन नहीं हुआ था। इससे पुष्टि होती है कि माल तस्करी का था और विदेशी मूल का था, जिसे भारत-म्यांमार सीमा के रास्ते लाया गया था। इसे वैध दिखाने के लिए, यह ग्रुप नकली जीएसटी इनवॉइस, फर्जी सप्लायर/खरीदार फ़र्म और झूठे ट्रांसपोर्ट कागजात का इस्तेमाल करता है।
इसके बाद, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में खरीदारों के ज़रिए पैसे का लेन-देन किया जाता है। ये खरीदार सिलचर/असम के हवाला ऑपरेटरों को भुगतान करते हैं, जो ज्यादातर मिजोरम रूरल बैंक के ट्रांज़िट अकाउंट्स के ज़रिए पैसे भेजते हैं। इन अकाउंट्स से असली जमाकर्ता की पहचान छिपी रहती है और पैसा चम्फाई के तस्करों तक पहुँचता है। आख़िर में, उन अकाउंट्स से बड़ी मात्रा में नकद निकालकर हवाला के जरिए म्यांमार के सप्लायरों को वापस भेज दिया जाता है, जिससे मनी लॉन्ड्रिंग का चक्र पूरा हो जाता है।
बैंक खातों, जीएसटी रिटर्न और इंटरनेशनल ट्रेड डेटा की जांच से पता चला है कि इस सिंडिकेट ने 1,500 करोड़ रुपये से ज़्यादा की अवैध कमाई (क्राइम से हुई कमाई) की थी। इस पैसे को करंट अकाउंट, इंटरमीडिएट अकाउंट और फ़्रंट/शेल कंपनियों के एक जटिल जाल के ज़रिए घुमा-फिराकर वापस तस्करों तक पहुँचाया गया। तलाशी अभियान के दौरान, कई चीज़ें ज़ब्त की गईं। इनमें सुपारी के व्यापार के मैनुअल रिकॉर्ड (डायरी), आरोपियों और उनके परिवार के सदस्यों के नाम पर मौजूद अचल संपत्तियों के कागज़ात (टाइटल डीड), बिज़नेस रिकॉर्ड, मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप और हार्ड ड्राइव जैसे इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, और 1.30 करोड़ रुपये की बेहिसाब नकदी शामिल थी।
तलाशी के दौरान तस्करों से जुड़े कुल 33 बैंक खातों को फ्रीज करने का आदेश दिया गया। तलाशी में यह भी पता चला कि अवैध कमाई को रियल एस्टेट में लगाया गया था। तस्करों और उनके सहयोगियों ने चम्फाई, सिलचर, गुवाहाटी, नबद्वीप, फलाकाटा, कोलकाता और वाराणसी जैसे शहरों में पॉश इलाकों में स्वतंत्र विला और ऊंची इमारतें (हाई-राइज बिल्डिंग) खरीदीं और उनका विकास किया।