20 साल से बाईपास और 16 साल से फाइलों में फंसा बस अड्डा, पलवल की बड़ी परियोजनाएं आखिर फाइलों में कैद क्यों?
पलवल में बाईपास, अंतरराज्यीय बस अड्डा और जिला जेल जैसी कई महत्वपूर्ण विकास परियोजनाएं वर्षों से कागजों में अटकी हुई हैं। ...और पढ़ें

विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच जिला आज भी अपनी बुनियादी और महत्वपूर्ण परियोजनाओं के धरातल पर उतरने का इंतजार कर रहा है। एआई इमेज
HighLights
पलवल बाईपास योजना 20 साल से अधूरी पड़ी है।
अंतरराज्यीय बस अड्डा 16 साल से कागजों में है।
जमीन विवाद में फंसी है जिला जेल परियोजना।
जागरण संवाददाता, पलवल। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच जिला आज भी अपनी बुनियादी और महत्वपूर्ण परियोजनाओं के धरातल पर उतरने का इंतजार कर रहा है। शहर में हाल-फिलहाल घोषित परियोजनाओं के अलावा पलवल शहर को जाम से मुक्ति दिलाने वाले बाईपास की योजना हो या फिर अंतरराज्यीय बस अड्डा, ये सभी बड़ी परियोजनाएं सिर्फ कागजों में गुम होकर रह गई हैं। कई वर्षों से इन योजनाओं की तरफ किसी का ध्यान नहीं है, जबकि इनके धरातल में उतरने से जिले के विकास को गति मिलती।
न तो शासन का ध्यान है और न ही प्रशासन का
बता दें कि 2008 में पलवल को जिला बनाया गया था। इसके बाद से पलवल में कई बड़ी योजनाओं ने रफ्तार पकड़ी। पलवल जिला कनेक्टिविटी के मामले में बड़े-बड़े शहरों को पछाड़ रहा है। जिला बनने के बाद कई बड़ी घोषनाएं विकास की रफ्तार बढ़ाने के लिए की गई थीं।
इनमें से कुछ शुरू होकर पूरी भी हो गईं। लेकिन कई बड़ी योजनाएं कागजों में ही दबी रह गई। कुछ योजनाएं जमीन की कमी के कारण पूरी नहीं हो सकी तो कुछ उदासीन रवैये के। इन्हें आगे बढ़ाने के लिए न तो शासन का ध्यान है और न ही प्रशासन का।
दो दशक बाद भी मास्टर प्लान में बाईपास
पलवल शहर में वाहनों के अत्यधिक दबाव और दिन-रात लगने वाले जाम से मुक्ति दिलाने के लिए दो दशक पहले एक बाईपास बनाने की योजना तैयार की गई थी। इस बाईपास के लिए जमीन भी अधिसूचित की जा चुकी थी। हैरान करने वाली बात यह है कि यह योजना हर बार प्रशासन के मास्टर प्लान में तो शामिल की जाती है, लेकिन 20 साल बीत जाने के बाद भी धरातल पर एक ईंट तक नहीं रखी जा सकी है।
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16 साल से हवा में अंतरराज्यीय बस अड्डा
पलवल की परिवहन व्यवस्था को मजबूत करने और यात्रियों को बेहतर सुविधाएं देने के लिए करीब 16 वर्ष पहले केएमपी-केजीपी इंटरचेंज के पास एक आलीशान अंतरराज्यीय बस अड्डा बनाने का प्रस्ताव रखा गया था। अगर यह बस अड्डा समय पर बन जाता, तो जिले में परिवहन सेवाओं की कमी और डग्गामार वाहनों की समस्या काफी हद तक हल हो जाती। लेकिन आज यह प्रस्ताव भी फाइलों में ही दफन है। फिलहाल परिवहन का भार पलवल बस अड्डे पर है, जहां बसों की भारी कमी है।
जमीन विवाद में फंसी जिला कारागार योजना
जिले में एक बड़ी और आधुनिक जिला जेल बनाने की कवायद वर्ष 2010 में शुरू हुई थी। जेल विभाग ने अलीगढ़ रोड पर 65 एकड़ जमीन अधिग्रहण के लिए अधिसूचना जारी की थी, जिसमें 3,000 कैदियों को रखने की क्षमता होनी थी। यह जमीन नगर परिषद सीमा के अंतर्गत रिहायशी क्षेत्र में आ रही थी, जिसका स्थानीय निवासियों ने कड़ा विरोध किया।
वर्ष 2013 में दोबारा अधिसूचना जारी हुई, लेकिन जमीन मालिक कोर्ट चले गए। फिलहाल शहर में पुराने कोर्ट के पास मात्र कुछ वर्ग गज में बनी छोटी सी जेल है, जिसकी क्षमता सिर्फ 60 कैदियों की है। जगह की भारी कमी के कारण पलवल के अधिकांश कैदियों को फरीदाबाद की नीमका जेल में शिफ्ट करना पड़ता है।
जमीन न मिलने से छिन गया वाईएमसीए यूनिवर्सिटी
पलवल में उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए भी महत्त्वपूर्ण योजना जमीन न मिलने के कारण पूरी नहीं हो सकी। आंकड़ों के मुताबिक, जिले में हर साल लगभग 8,000 छात्र 12वीं पास करते हैं, जिनमें से करीब 5,000 छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए मजबूरन दूसरे जिलों का रुख करना पड़ता है।
इसी समस्या को देखते हुए वर्ष 2014 में धतीर गांव में वाईएमसीए विश्वविद्यालय बनाने की घोषणा की गई थी। लेकिन प्रशासन विश्वविद्यालय के लिए जमीन मुहैया कराने में नाकाम रहा, जिसके बाद इस परियोजना को फरीदाबाद स्थानांतरित कर दिया गया।
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