देश की राजनीति से Left कैसे हुई 'लेफ्ट'? केरलम में आखिरी किला भी ध्वस्त, 50 साल का इतिहास
केरलम विधानसभा चुनाव में वामपंथी गठबंधन (एलडीएफ) की हार ने भारतीय राजनीति में 50 साल के इतिहास को बदल दिया है। यह पहली बार है जब देश में किसी भी राज्य ...और पढ़ें

केरलम में एलडीएफ की हार के साथ 50 साल बाद सत्ता से बाहर लेफ्ट
HighLights
केरलम में एलडीएफ की हार, 50 साल बाद सत्ता से बाहर
भारतीय राजनीति में पहली बार कोई लेफ्ट सरकार नहीं
पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा के बाद केरल भी हाथ से निकला
गरिमा सिंह। भारत की राजनीति में पिछले 50 सालों में बहुत कुछ देखने को मिला। लेकिन आज यानी 4 मई को केरलम विधानसभा चुनाव के रुझानों में वो देखने को मिला जो पिछले 5 दशकों में कभी नहीं हुआ। कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ गठबंधन भारी बहुमत की ओर बढ़ रहा है इसी के साथ वामपंथी का आखिरी किला भी ध्वस्त होता दिख रहा है।
पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला एलडीएफ सत्ता से बाहर होने जा रहा है। इस हार के साथ ही पूरे देश में पिछले 50 वर्षों में पहली बार ऐसा होगा जब किसी भी राज्य में लेफ्ट की सरकार नहीं बचेगी। यह घटना वामपंथी राजनीति के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखी जा रही है।

ममता ने ढहाया था बंगाल में लेफ्ट का किला
1977 में पश्चिम बंगाल में लेफ्ट की सत्ता आने के बाद से यह विचारधारा विभिन्न राज्यों में मजबूत किलों के रूप में स्थापित रही थी। पश्चिम बंगाल में 34 साल तक लगातार शासन करने के बाद 2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने इसे ढहाया।
जिसके बाद 2016 और 2021 में लगातार ममता के नेतृत्व वाली कांग्रेस सत्ता में आती रही। ममता के 15 साल के शासन को आखिरकार 2026 में भाजपा बेदखल करती नजर आ रही है।
त्रिपुरा में बीजेपी ने खदेड़ा
त्रिपुरा में भी 2018 में भाजपा ने लेफ्ट को 25 साल की सत्ता से बेदखल किया था। अब केरलम, जो लेफ्ट का अंतिम गढ़ था वो भी उनके हाथ से निकल गया है। केरल में लेफ्ट की सरकारें वैकल्पिक रूप से आती-जाती रही हैं। 2021 में पिनाराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ ने लगातार दूसरी बार जीत हासिल कर इतिहास रचा था, लेकिन इस बार जनता का रुख बदल गया।
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रुझानों के अनुसार यूडीएफ बहुमत के पार पहुंच रहा है, जबकि एलडीएफ काफी पीछे है। इस हार के कई कारण बताए जा रहे हैं, जिनमें लंबे शासन से उपजा असंतोष, स्थानीय मुद्दे और विपक्ष की मजबूत रणनीति शामिल हैं।
कैसे लेफ्ट हुई लेफ्ट?
स्वतंत्र भारत में वामपंथी दलों ने शुरुआती दौर में अच्छा प्रदर्शन किया। 1957 में केरल में पहली कम्युनिस्ट सरकार बनी। 1960 के दशक से 2000 के शुरुआती वर्षों तक पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल में उनकी मजबूत उपस्थिति रही।
2004 के लोकसभा चुनावों में लेफ्ट दलों ने 59 सीटें जीतीं और यूपीए सरकार में महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभाई। लेकिन 2008 में परमाणु समझौते जैसे मुद्दों पर समर्थन वापस लेने के बाद 2009 में उनकी सीटें घटकर 24 रह गईं। 2014 और 2019 में यह संख्या और कम हुई।

राज्यों में भी यही सिलसिला चला। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के बाद केरल की हार ने लेफ्ट को संगठनात्मक और वैचारिक चुनौतियों का सामना करने पर मजबूर कर दिया है। कई विश्लेषक इसे वामपंथी विचारधारा के राष्ट्रीय स्तर पर हाशिए पर जाने का संकेत मान रहे हैं।
आब आगे क्या होगा?
एलडीएफ की हार के बाद पिनाराई विजयन और अन्य वामपंथी नेताओं पर सवाल उठ रहे हैं। पार्टी को अब युवा वोटरों, बदलते सामाजिक-आर्थिक मुद्दों और उभरती शक्तियों जैसे भाजपा के साथ नई रणनीति बनानी होगी। वहीं, कांग्रेस के लिए यह जीत राहुल गांधी समेत पार्टी नेतृत्व को दक्षिण भारत में मजबूती देगी।
भारत की बहुलतावादी राजनीति में लेफ्ट ने हमेशा सामाजिक न्याय, श्रमिक अधिकारों और समानता की आवाज उठाई है। हालांकि, बदलते समय के साथ खुद को ढालने में नाकामी ने उन्हें इस मुकाम पर पहुंचा दिया। अब देखना होगा कि वामपंथी दल इस हार से सबक लेकर पुनरुत्थान का रास्ता अपनाते हैं या आगे भी गिरावट जारी रहती है।