बीजेपी का कमालः इतने कम वोट और इतनी ज्यादा सीटें
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यहां तक कि 1967 में 280 सीटें जीतने वाली सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को भी 40.8 फीसदी मत मिले थे।
वोट फीसद और सीटों का ये अंतर इसलिए भी चौंकाता है क्योंकि एक वोटर यही समझता है कि ज्यादा वोट मतलब ज्यादा सीटें।
कैसे होता है ये खेल
आइए कम वोट के बावजूद ज्यादा सीटें जीतने का ये खेल समझते हैं।
10 में से चार वोटरों ने राजग को चुना लेकिन तीन में से एक वोटर ने भाजपा को नहीं चुना।
कांग्रेस और उसके सहयोगियों को चुनने वाले बहुत कम रहे यानी पांच में से एक वोटर ने कांग्रेस के नाम पर मुहर लगाई और चार में से एक ने यूपीए को वोट दिया। इस तरह कांग्रेस को 19.3 फीसदी मत मिले।
विडंबना देखिए 19.3 फीसदी वोटों को कांग्रेस महज 44 सीटों में तब्दील कर पाई जबकि 2009 में 18.5 फीसदी वोटों को भाजपा ने 116 सीटों में बदल दिया था।
भाजपा और कांग्रेस (देश की दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां) की बात करें तो इन दोनों पार्टियों को इस बार संयुक्त रूप से लगभग 50 फीसदी मत मिले हैं। यानी कि देश के 50 फीसदी मतदाता ने कांग्रेस और भाजपा से इतर किसी दूसरे दल पर भरोसा किया है।
वहीं एनडीए और यूपीए के प्रदर्शन की बात करें तो राजग का संयुक्त वोट प्रतिशत महज 38.5 फीसदी रहा और संप्रग का वोट प्रतिशत 23 फीसदी रहा। अर्थात 39 फीसदी शेयर राज्यों की अन्य पार्टियों के नाम रहा।
लहर कैसे बनी कहर
इस वजह से विभिन्न क्षेत्रीय दल अपनी विपलताओं के चलते अपने वोटर को सहेजने में कामयाब नहीं हो पाए। एक तरफ क्षेत्रीय दलों के प्रति नाराजगी और दूसरी तरफ प्रचार प्रसार का अच्छा खासा प्रभाव। भारत में पहली बार वोट बैंक इस कदर दरका है कि समूचे समीकरण ही बदल गए।
राजग के सहयोगियों से नाराज जनता ने भाजपा को वोट दिया। जबकि संप्रग के सहयोगी दलों से नाराज जनता ने अपने क्षत्रपों को वोट नहीं दिया। एक तरफ लोग अपनी राज्य सरकारों से नाराज थे तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार के प्रति नाराजगी थी। इसका नतीजा ये निकला कि संप्रग में शामिल क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस के प्रति वोटर की नाराजगी भी झेलनी पड़ी।
...और बंट गया वोट
उत्तर भारत के कुछ राज्यों की बात करें तो यहां कई उम्मीदवारों को एक-चौथाई तक वोट मिले लेकिन वह सीट जीतने में नाकाम रहे।
उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान के अलावा बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ समेत और कई राज्यों में इस बार कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के विरोध की लहर का असर साफ तौर पर दिखा है।
ऐसा रिकार्ड कभी न बना
1989 में नेशनल फ्रंट ने 146 सीटों पर विजय प्राप्त की जबकि इस फ्रंट को मिला वोटिंग शेयर महज 23.8 था।
2004 में 36 फीसदी मत शेयर पर कांग्रेस ने 220 सीटों पर कब्जा किया था।
उस दौरान यूपीए की सरकार बनी और गठबंधन दलों को मिली 320 सीटों की तुलना में वोटिंग फीसदी 47 फीसदी था।