प्रदेश में लगभग 75 हजार हेक्टेयर में धान की फसल पर पहली बार स्लग कैटपिल्लर ने हमला बोला है। इससे फसल को खासा नुकसान हो रहा है। विशेषज्ञों की मानें तो हिस्पा, चैपर वीटल (भृंग), धान का छेदक और काला वीटल जैसे पारंपरिक कीट अब तक धान की फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। यह पहला मौका है, जब स्लग कैटपिल्लर ने किसानों की फसलों पर हमला बोला है। धान के पौधों के साथ चिपककर यह कीट निचले और मध्य स्तर पर फसल को नुकसान पहुंचा रहा है। कुछ स्थानों पर इस फसल में ब्लास्ट और फाल्स स्मट जैसे रोगों के लक्षण भी सामने आए हैं।
इसका खुलासा तब हुआ, जब विभाग के विशेषज्ञों की जिला स्तरीय टीम ने जिले में कई स्थानों का दौरा कर सर्वेक्षण किया। टीम का नेतृत्व कर रहे आत्मा परियोजना कांगड़ा की निदेशक डॉ. विनता सूद ने बताया कि सर्वेक्षण में पाया गया है कि पारंपरिक कीटों के अलावा स्लग पिल्लर नाम का कीट फसल में लग गया है। इन कीटों और बीमारियों से प्रभावित क्षेत्रों में दवाएं सुझाई गई हैं। प्रदेश में लगभग 75 से 80 हजार हेक्टेयर भूमि में धान की पारंपरिक खेती किसान कर रहे हैं। जिला कांगड़ा में लगभग 35 हजार और मंडी में लगभग 25 हजार हेक्टेयर भूमि में धान की फसल हो रही है। कीटों के प्रकोप से धान की पत्तियों पर सफेद धारियां बनना, पौधों का मुरझा कर मर जाना सहित फसल के दूधिया भाग को खाकर कीट सिट्टे को खाली दाने के रूप में छोड़ रहे हैं। किसानों को विशेषज्ञ वैज्ञानिकों ने कीट नाशक दवाइयों के छिड़काव की सलाह दी है। बताया कि कलोटपायरीफास, साइपरमेथरीन, मिथाइल पैराथियान और फैनीट्रोथियान दवाइयां उक्त अलग-अलग कीटों के नाश के लिए कारगर हैं। विभाग की सर्वेक्षण टीम में जैव वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार, गेहूं एवं धान अनुसंधान केंद्र मलां के कीट वैज्ञानिक डॉ. अजय श्रीवास्तव, पादप रोग विशेषज्ञ डॉ. सचिन उपमन्यु और राज्य जैव नियंत्रण प्रयोगशाला पालमपुर के डॉ. अतुल डोगरा शामिल हैं।